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Showing posts from 2019

इबादत - तबिष खैर

बख्श दो मुझे,  एक नन्हा सा बच्चा जिसे छुपा सकूं मैं जब मौलाना घर आएं,  नमाज़ को जब हवाई जहाज़ हों -  शिकारी परिंदे। छोटा सा कोई, अंगूठे से भी छोटा, जिसे जेब में रख,  भाग सकूं।                                   तबिष खैर                                अनुवाद - दिवाकर एपी पाल

इराक़ से लौटा एक सिपाही - तबिष खैर

कर भी क्या सकता था,  वो जो में था वृद्ध महिलाओं का रक्षक,  और कातिल भी। मेरे सीने पर बैठी थी  एक कुत्तिया, जवाब ढूंढ़ने को प्रशिक्षित - चलती थी, उछलती थी,  इशारों पर। अपनी एम सोलह एटू से  दाग दी मैंने गोलियां - वहीं लुढ़क गई वो,  मर गई वो। अपने घर पर,  मैं भी समृद्ध था हसीनाएं खेलती थी,  मेरे झबराले गेसुओं से, सपनो में, नशे में, चूर हम साथ से जाते थे। अपनी ही मर्ज़ी का मालिक था मैं, तब तक जब कैदखाने के सायों से घिर गया, और सहसा मुझे याद आया, कुछ जो मैं भूल चुका था, जो अब तक याद ना आया। क्या था वो -  एक बत्ती, शमा, या कांगरी? कुछ तो रोशनी का ही था, कुछ  जो शायद मुझे,  आजाद कर सकता था।                                      - तबिष खैर                                    अनुवाद - दिवाकर एपी पाल

नमक और नमकहराम - मलय रॉय चौधरी

अपनी जीभ से छुआ था,  मेरे जिस्म को तुमने अवंतिका,  और कहा था -  "आह, लावणी सौंदर्य दिलों के दिल..  मर्दानगी की खुशबू..." उस दिन,  पुलिसिया हिरासत से  अदालत की ओर कमर में बंधी थी रस्सी,  और हथकड़ी में हाथ उपद्रवी हत्यारों के मध्य,  चल रहा था मैं; तमाशा देखती भीड़,  जमा थी  सड़क के दोनों तरफ। उन विश्वासघाती जनों,  जिन्होंने स्वेच्छा से अदालत में दी शहादत,  मेरे खिलाफ,  ने कहा, कटघरे में खड़े होकर -  "ना जी! मीठा था वो पसीना,  ना कि नमकीन; फिर  नमकहरामी का तो सवाल ही नहीं - हमें नमकहराम ना बुलाया जाए!"                     नून ओ नीमकहरामी - मलय रॉय चौधरी                                     (कोलकाता - 2005)                     अनुवाद - दिवाकर एपी पाल 

शमशान - मलय रॉय चौधरी

एक दोपहर,  धान की भूसी उड़ने के मध्य एक मृत उल्लू के शव से उड़ते  पिस्सू-शावक चुरा रहे थे वसा। उनके हाथों में,  मूढ़ी की भीनी सी खुशबू आक के फूलों के,  रुंधे गले से निकली चीखें,  धीमे से उठाकर जैसलमेर की भंगुर,   मंद बयार में पर-पीड़नशील सुख! सर्पीले शहर में,  रक्त-रंजित दीवार घड़ी की बड़ी सुई और आग की दप्त रोशनी में  मुस्कुराते इंसानी चेहरे। फड़फड़ाते कबूतर,  फटे दस्तावेजों की-सी आवाज में,  थोड़ी सी जीते हुए अपनी ज़िंदगी। सूर्यास्त के रंग सी दीप्त भौहें, सवार, ज्वार के दौरान,  एक मनहूस नौका पर रूखे लेवणी में लिपटा शव। बढ़ा मैं,  स्वर्णिम नद-मुख की ओर हथेली में पकड़े हुए,  एक क्षणिक चक्रवात की एक गांठ। फेंके हुए  धान के लावों का  छाती पीटता रुदन - सिर्फ वही मेरा था।                                   शमशान - मलय रॉय चौधरी (1992)                                    अनुवाद - दिवाकर एपी पाल

एक अर्ध-सरकारी प्रतिवेदन - मलय रॉय चौधरी

शस्त्रहीन सेना की प्रार्थना चुल्लू भर पानी का मोल -  10 रुपए। भूमिगत जल राशि का  उद्गम - स्थल से विच्छेद आदतन, ईर्ष्या मिश्रित घृणा कठोर शब्दों द्वारा  सीमा पर प्रतिबंध लोक निर्माण विभाग का पतन। टमाटर के खेत में,  हाथ में लेकर डाकबद्ध  मत पड़ा है,  मौलिक मंथर मनुष्य,  अंतहीन अपेक्षा में, संसद के लिए महत्वाकांक्षी जूते कहने दो उन्हें, कुछ भी -  खाओ धोखे! हुंह,  जैसे धान के खेत डरते हों,  शेर की दहाड़ से कृषक कन्या आज मंत्रालय में बैठी है। फुटबॉल के मैदान के कोने में लगी,  एक सीधी चोट से हुई पुत्र की मृत्यु पर,  शोकाकुल है -  एक थका, डरपोक इंसान। स्वतंत्रता संग्राम की समस्या का हल अंकित है -  मृतक के माथे पर -  एक अकाट्य सत्य!              एकटी अधा-सोरकारी प्रोतिवेदन - मलय रॉय चौधरी                                                   (1996)                अनुवाद - दिवाकर ए पी पाल

ध्रुपद धोखेबाज - मलय रॉय चौधरी

ध्रुपद धोखेबाज!  उतर आओ पालकी से! गुलामी छोड़ दी है मैंने एक उबाल उमड़ रहा है,  जिस्म में कमर से गर्दन तक। यह कोई मुफ़्त लंगर नहीं, जहां चीनी थाल लिए,  करो तुम अपनी बारी का इंतज़ार। ओ अनछुए धन!  आओ लिए अपनी साबुत मादकता बेरोजगारों के मध्य,  सब्जपोश तितली की तरह; पैराशूट से झूलती,  घंटियों का शोर,  और आरक्षियों द्वारा नज़रबंद,  और  मेरे पत्रों का दोषान्वेषण। स्वार्गिक स्वामी -  बेड़ियों में कब तक? उठ खड़ा होऊंगा,  चारों पैरों पर,  और तोड़ दूंगा तुम्हारी गर्दन चढ़,  मक्के के ढेर पर,  लहराऊंगा अपने मेंहदी-सन केश,  भूसे के मंच से,  ओह, ध्रुपद धोखेबाज!  आ जाओ खुद से वर्ना तुझे दिखाऊंगा मैं -  नर्क - द्वार!                ध्रुपदी घोच्चोर -  मलय रॉय चौधरी                     अनुवाद - दिवाकर ए पी पाल

प्रचण्ड विद्युतीय काष्ठकार - मलय रॉय चौधरी

ओह, मैं मर जाऊंगा, मर जाऊंगा, मर जाऊंगा। दग्ध उन्माद से तड़प रहा, ये मेरा जिस्म क्या करूं, कहां जाऊं, जानता नहीं; ओह, थक गया हूं मैं। सारी कलाओं के पुष्ठ पर लात मार, चला जाऊंगा, शुभा! शुभा - जाने दो मुझे, और छुपा लो, अपने आंचल से ढंके वक्ष में। काली - विनष्ट, केसरिया पर्दों के खुले साए में आखिरी लंगर भी छोड़ रहा है मेरा साथ, सारे लंगर तो उठा लिए थे मैंने! अब और नहीं लड़ पाऊंगा, लाखों कांच के टुकड़े प्रांतष्थ में चुभते हुए जानता हूं, शुभा, अपनी कोख फैलाओ, समेट लो - शांति दो मुझे। मेरी हर नब्ज़, एक उद्दत्त रुदन का गुबार, ले जा रही है हृदय तक अनंत वेदना से संक्रमित - मस्तिष्क प्रस्तर सड़ रहा है! क्यूं नहीं तुमने मुझे जन्म दिया, एक कंकाल के रूप में? चला जाता मैं दो अरब प्रकाश वर्ष दूर - और नतमस्तक हो जाता खुदा के समक्ष पर, कुछ भी अच्छा नहीं लगता, कुछ भी नहीं। उबकाई आती है, एक से अधिक चुम्बन से। भूल जाता हूं, कई बार मैं बलात् संभोग के वक्त, सामने पड़ी स्त्री को और लौट आता हूं अपनी काल्पनिक दिवाकर समवर्णी - तप्त वस्ती में। नहीं पता मुझे, ये क्या है, पर ये मेरे अंतर्मन म

मेरी घड़ी

ये मेरी घड़ी, थोड़ी पुरानी हो गई है। एक नई की ज़रुरत तो नहीं है शायद, शायद कलाई पर इसे देख-देख, ऊब-सा गया हूँ। बदरंग सी लगती है इसकी स्टील की बेल्ट - घिस गई है मेरी कलाई की रगड़ से। खरोंचें हैं, इसकी डायल पर शायद कभी, इसके सहारे गिरा होउँगा किसी दिन। काँच पर पडी किरचें शायद ऐसी ही कुछ यादें हों। पर ये घड़ी मेरी, वक्त सही बताती है। कुछेक पल की हेर-फेर, शायद थक जाती है, कभी-कभी। सालों पहले शादी के दिन, मेरे ससुर ने बाँधा था इसे, मेरी कलाई पर। तब से ही, मेरा वक्त इसी घड़ी से जुड़ा है। थोड़ी पुरानी ही सही, पर ये घड़ी मेरी है। नई की ज़रुरत नहीं है मुझे! 6 नवंबर, 2019

दाँत का दर्द

पिछले कुछ दिनों से एक दांत दर्द दे रहा था पता नहीं क्यों पर, सड़ चुका था वह। शायद, बचपन की चॉकलेटों की मिठास थी वजह, या रोज रात की दूध, या मटन चिकन के फँसे टुकड़े जो कुल्ले से साफ न होते थे। या शायद जवानी की लापरवाहियाँ - अक्सर रात की मज़लिस के बाद सुबह ब्रश ना करना या फिर दोस्तों के सामने कूल दिखने की कोशिश में, बियर की ढक्कनों के ऊपर आजमाइश या लगातार जलती सिगरेट की कशों से जमी कलिश की परतें। जो भी हो, सच - एक दांत सड़ गया था। दर्द, जो अब दांत से बढ़कर पूरे जबड़े पर फैला था। खा रहा था, पेन किलर, दिन के चार-चार, पर यह दर्द वापस उभर आता था! नींद से उठता था मैं बार-बार दिन को काम भी नहीं कर पाता था। उस दांत को निकलवा दिया है मैंने जबड़ा अब खाली-खाली सा लगता है वैसा ही जैसे कोई कड़वा रिश्ता छूट गया हो। अब दर्द नहीं होता दाँतों मे, अब चैन से सोता हूँ रातों को! - 2 नवंबर, 2019