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यादों की गठरी

कहते हैं – घर में छुपे किसी सामान से, बिगड़ जाता है घर का वास्तु; और छिन जाती है शांति। यही सोच कर शायद, जानबूझकर छोड़ी थी मैंने, तुम्हारे मन-मंदिर के एक अनछुए कोने में – जहां पहुँच ना सके तुम्हारे हाथ, या नज़र - अपनी यादों की गठरी। छुपाई थी – स्वार्थ वश ताकि, दूर चले जाने पर भी कभी-ना-कभी मेरा ख़याल, किसी नशेमन में कर सके तुम्हें बेचैन। बँधी है उस गठरी में कितनी ही शामें – कुछ नर्म, कुछ सर्द कुछ – पसीने से भीगी। कितनी सुबहें, तुम्हारे गीले बालों से झटकती बूंदें। कितनी रातें, मेरे कंधे पर टिका तुम्हारा सिर, और सीने पर बिखरी जुल्फ़ें। कितनी अलसाई दोपहरी - छोड़े हैं मैंने, तुम्हारी गर्दन पर, कान के नीचे – अपनी तप्त साँसों की भाप; और तुम्हारी कमर पर अपनी उँगलियों के एहसास। शायद किसी सर्द शाम में तुम्हारे काँपते कंधों पर रखा था अपनी जैकेट का भार; देखी थी किसी उदास शाम में तुम्हारे गालों पर ढलके अश्क़ और किसी खिलखिलाती सुबह की रोशनी-सी, तुम्हारे होंठों पे हँसी। भारी थी बहुत, जब बांधी थी मैंने वो गठरी – अपने अकेले कंधे पर उसका बोझ गवारा नहीं था मुझे! हाँ – स्वार्थी था मैं – छोड़ दिया था मैंन