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Wednesday, January 19, 2011

a new take on poetry....

एक और दिन ढल गया,

बोझिल और लाचार सा;

स्तब्ध चांदनी को कोहरे ने

छन्नी सा ढँक रखा है..

शायद ऒस की बूँद से भीगा होगा,

य़े गाल गीला मालूम पडता है;

आँसू तो अब आते नहीं,

इन पथरायी आँखों में.

जिन्दा रहने की चाहत है,

पता नहीं कैसे;

सफ़र ये कैसा है, चलना भी

रोज़ है और जाना कहीं नहीं.

मंज़िल क्या होती है,

जाना नहीं अब तक;

बस बेज़ार सा सफ़र है

पगडन्डी के रास्ते...

Dated: 16 January,2011

Saturday, January 15, 2011

गुलपोश ये बदन

लोहबान सी महकती अदा;

होंठों को तेरे छूने से

खिलखिलाने लगी ये फ़िज़ा.

रंगीन हुआ समाँ

रौशन हुआ जहाँ;

रेशम सी नाज़ुक अलकें

जैसे घिर आई हो घटा.

इन घटाओं की बारिश

मे भीगने की ख्वाहिश;

फ़िरते हैं तेरे आगे-पीछे,

दीवानों के माफ़िक.

आवारा तेरी नज़रें,

गवारा नहीं मुझको.

देखती हैं क्यूँ जमाना,

जमाना क्यूँ देखे तुझको??

dated: 22 October, 2010


Dated: 22 October, 2010.

Bekhayali..

Khushboo ye teri, Hawa jo layi hai;
Humpe ye kaisi, khumari chhayi hai.

Khoya mai tere, dilkash khayalon me;
Soya mai teri, Chaahat ke khwabon me.

Raaton ko jaagun, Din ko tadpun..

Bekhayali me bhi, Tera hi khayal hai;
Kya hai ye, Bas yahi sawaal hai..

dated: 20 Nov, 2010