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Monday, October 18, 2010

स्वच्छन्द बन्जारा

स्वच्छंद बंजारा

एक अकेला ख्वाब था देखा,

नन्हा-नन्हा, प्यारा-प्यारा;

एक अकेले ख्वाब की खातिर

वारा मैंने जीवन सारा.

एक अकेला ख्वाब ही था वो

मेरे जीने का सहारा;

एक अकेली जीत थी जिसके

लिये मैं अप्ना सब कुछ हारा.

जीती न थी ये दुनिया मैंने

जीत वो थी बस मन-ही-मन में,

जीत न थी वो पल भर की

जश्न का लम्हा पल में सिमटा.

सिमट आयी थी जहाँ की खुशियाँ,

सिमट आया था जहाँ ये सारा;

एक जीत का ख्वाब था मेरा

जीवन का वो लम्हा प्यारा.

अब न रहे कोई ख्वाब इस मन में,

अब न रहा कोई मकसद प्यारा.

आब जी सकता हूँ खुल कर मैं

अप्ना जीवन स्वच्छन्द बन्जारा...

dated: 19th Oct,2010