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Showing posts from 2021

ख़बर

 बताया हमें - पाकिस्तानी, ख़ालिस्तानी, देशद्रोही -  राजधानी में प्रवेश निषेध  गड्ढे-कीलें, कँटीली तारों से बनी बाड़; देश बचा लो, आए किसान! छुपाया - 2 डिग्री की सर्द रातें,  वॉटर क़ैनन की ठंडी बौछारें  बर्फीली हवा, बारिश का पानी। 40 डिग्री की तप्त दोपहर, आँखों को चुंधियाती धूप।  गोली की मार, और  जीप की टायर की ज़द।  और हमें दिखाया महज़ - एयरकंडीशन तम्बू, लंगर का पिज़्ज़ा,  वाई-फ़ाई के राउटर, राहती मसाज़।

क्या विषय, क्या विषय!

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अरे रबीन्द्रनाथ! पहचाना? नाचा था मैं तुम्हारे साथ? इकतारे पर लोक-गीत की अधूरी धुन बजाई थी भीड़ वाली गली से सुनसान लौंग बाजार तक साथ चलते-चलते बताया था तुमने – तुम सियालदह से आ रहे, और अलमुद्दीन के दफ्तर तक जा रहे। तुम्हारे गर्म, अंगारों-से होंठों पर – जो बने थे आग और पानी से, अब भी पवित्र गीतों की तान थी – कितनी तप्त! तुमने फेंक दिया अपना ऊनी लबादा, जिसमें छुपे थे जोंक – मुझे जोंक दिखे थे! तुम्हारे सुर्ख बदन पर – जोरसांको ठाकुरबाड़ी मे बहुत जोंक होते हैं, बरसात के दिनों मे। मटन कबाब की गंध पर, जब तुमने पूछा – क्या पका रहे हो मियाँ? उसने बोला – पता नहीं तुम्हें! सिर्फ़ साँड़ का माँस। एक खाकर तो देखो। चाय की टपरी पर, गंजे, बकर-दाढ़ी वाले व्लैदिमिर इल्लिच, सुनहरे बालों वाली वेरा इवानोवा यासुलीच और तुम्हारे जैसे चंदीली दाढ़ी वाले एग्जेलरॉड और मार्तोव जिनके गाल काँप रहे थे, और तुमने पूछा था – इनके धड़ कहाँ हैं? जब मैंने नाचना बंद नहीं किया, असहाय था मैं तुमने अपना इकतारा  मुझे दान दे देना चाहा क्यूँकि हर किसी ने, मौक़ा पाते ही, छीनी है तुम्हारे कदमों की ताल और अभी, दिन के वक्त भी हैलॉजेन जले है

अजीब से बच्चे

वो गोद में बैठ या कंधे से लटक लोरियाँ नहीं सुनना चाहते ना किस्से। वो सिहर जाते हैं, जब गुजरता हूँ  उनके पास से उनकी हंसी, दबी-दबी सी है पर, वो रोते तो कभी नहीं दिखे मुझे। खेलते तो हैं आपस में, पर सहम जाते हैं जब दिखाऊं चॉकलेट या बिस्कुट। अक्सर सोते हुए चौंक कर उठ जाते हैं बिस्तर में। ये कैसे बच्चे हैं, जो हम बड़ों के एहसास से भी डरते हैं।                               14 -अगस्त - 2021

जनता भूल जाएगी

आंकड़ों की बाज़ीगरी में लग चुके हैं मानवीय संवेदनाओं के सौदागर। यकीन है उन्हें, याददाश्त क्षणभंगुर है जनता की - भूल जाएगी! धर्मांधता और जातिवादी नारों के शोर में - अपनों की मौत और अपने खुद के आंसू -  शमशानों में  जलती चिताओं की लपटती लौ गंगा में बहती पानी से फूल चुकी लाशें -  दफ़न, ज़मींदोज़  अनजान लाशें,  जो कभी लोग थे। जनता भूल जाएगी  मदद की गुहार पर मिली  अनजानी शक्लों के हाथों - नाम, पता, शक्ल, या जाति-धर्म पूछे बिना अनजाने कंधे, सहारे और  खून और हवा।    याद रहेगा बस अपना मजहब, अपने धर्मगुरु, अपनी जाति, अपना गुमान! अपनी नफरत वापस सर उठाएगी और उंगलियां चलेगी वोट पर या कटारें, गड़ांसे, या जुबान। जो भी हो, जनता भूल जाएगी।                                    - 12 अगस्त, 2021

अपवित्र

गांव के एक छोर पर मेरा घर था, और कभी गांव से बाहर जाना मेरे नसीब में 10 साल की उम्र तक आया नहीं। 10 साल की उम्र में पिताजी ने नवोदय विद्यालय की परीक्षा दिलवाने के लिए पहली बार मुझे गांव से मुजफ्फरपुर तक का सफर कराया था। ये, 1992 की बात रही होगी शायद।  आज भी बिलकुल साफ साफ याद है मुझे, वो पहला सफर। मां ने ठेकुआ, निमकी और लिट्टी, थोड़े प्याज और हरी मिर्च के साथ बांध कर दिया था, जो खादी के चारखाने प्रिंट के थैले में (हम उसे झोला बोलते थे) रख कर पिताजी और मैं, मुंह-अंधेरे निकल गए थे। पड़ोस वाले महतो चाचा ने अपनी बैलगाड़ी से हमें कस्बे तक पहुंचाया था, उनको हाट करना था, और हमें आगे मुज़फ्फरपुर तक जाना। यहां से हमने एक बस ली थी, जिसने मुज़फ्फरपुर पहुंचा दिया था 7 बजे तक। परीक्षा सेंटर के बाहर पहुंचने में हमें 15-20 मिनट और लगे होंगे। परीक्षा 10 बजे से होनी थी, तो पिताजी ने एक अखबार खरीदा, और उसे बिछा कर हम दोनो ने पहले उसपर बैठ कर खाना खाए, और फिर आजू-बाजू लेट गए। मेरी आंख लग गई थी, पर पिताजी शायद सिर्फ कमर सीधी करना चाहते थे।  दो घंटे का पेपर रहा होगा, और प्रश्न क्या क्या थे मुझे याद नहीं। म

मेरा स्वदेस

नहीं कह सकता,  कि उत्तरपारा का मेरा पैतृक घर,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  आँखें-नुचीं लावारिश लाशें गंगा में तैरती है वहाँ।  नहीं कह सकता,  कि अहिरीटोला में मौसी का घर,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  अपहृत लड़कियाँ बंधी, घुटती हैं पास ही सोनागाछी में। नहीं कह सकता,  कि पनिहाटी में चाचा का घर,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  कौन कहाँ मारा गया, सरेआम दिन-दहाड़े। नहीं कह सकता,  कि बचपन का कोणनगर वाला घर,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  किसे भेजा गया था, गला रेतने को।  नहीं कह सकता,  कि जवानी का कलकत्ता,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  किसने फेंका था बम, लगाई थी बसों-ट्रामों में आग। नहीं कह सकता,  कि पश्चिम बंगाल,  मेरा स्वदेस नहीं  हक़ है मुझे, यहाँ  लॉक-अप में बंद, मृत्यु-पर्यंत यातनाओं का। हक़ है मुझे, यहाँ  चाय बाग़ानों में भूखमरी का। हक़ है मुझे, यहाँ  हैंडलूम मिलों में फांसी लगा झूलने का। हक़ है मुझे, यहाँ  मिट्टी में दबी हड्डियों के ढेर बन जाने का। हक़ है मुझे, यहाँ  मेरा मुँह बंद कर दिए जाने का।  हक़ है मुझे, यहाँ  राजनेताओं की बकवास, गालियाँ सुनते जाने का।  हक़

पुणे डायरी - भाग एक (घुंघराले बालों वाली लड़की)

कॉलेज का गेट, जिसपर एक तोरण द्वार बना था, और अर्ध चंद्राकार काँक्रीट के फ़्रेम पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी के नाम दो भाषाओं में ऐल्यूमिनीयम की चमकती प्लेटों से लिखे थे – अंग्रेज़ी और मराठी। किसी जमाने में अंग्रेज़ी का साथ हिंदी को नसीब था, लेकिन अब ऐसा करना लोकल मानुष को चुनौती देना भी था, और क़ानूनन अपराध भी। हाँ, अगर तीन भाषाएँ लिख दो, तो किसी को आपत्ति नहीं होती, लेकिन इतनी ज़हमत और अतिरिक्त प्लेटों का खर्च उठाने की ज़रूरत ही क्या थी?  तोरण के नीचे दो फाटक थे, एक क़रीब 25 फ़ीट चौड़ा और दूसरा क़रीब 4 फ़ीट का। चौड़ा वाला फाटक गाड़ियों के लिए खुलता था, जिसे खोलने दरबान खुद चल कर आता था, और गुजरने वाली गाड़ियों को पहचान कर किसी किसी को सलाम भी ठोंकता था। संकरा वाला फाटक अमूनन खुला ही रहता था, और मोटर-साइकल, साइकल, स्कूटी और पैदल चलने वालों से दरबान उनका पहचान पत्र देखने के बाद ही पार करने की इजाज़त देता था। आर्थिक समाजवाद का ये नियम अलिखित, पर अटूट था। इसी फाटक के बाहर एक प्लास्टिक के बोरे को बिछाकर एक बुढ़िया बैठती थी, जो सिगरेट, पान-मसाला और गुटखा मार्केट प्राइस से 1 रुपया अधिक पर बेचती