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Thursday, May 26, 2011

किन्नर कहता है: (The Hijra Speaks-Tabish Khair)

यदि लज्जा एक कला है,
तो निर्लज्जता एक करतूत:
उद्देश्य तो दोनों का ही
स्व-मात्र की रक्षणा है.

तुम सीखती हो,
हया से नजरें झुकाना;
हम नजरों की तीक्षणता से
बेहयाई का रोष दर्शाते हैं.

उस देश में, जहाँ नव-वधुएँ
हया की मूरत हैं;
वहीं हम जैसी भी हैं, जिनकी
बेशर्मी, प्रहार-सम सूरत है.

उनकी कला की ज़रुरत
दूसरों द्वारा उनका भविष्य-निर्धारण;
और यही वह वजह है;
जिसे छुपाते हैं हमारे कार्य.

हम खडे हैं, आमने-सामने,
हम खडे हैं, पीठ से पीठ लगा के:
वो सहती हैं उसी ’नियामत’ का प्रहार,
जिससे हम वंचित हैं.

जो हमें अलग करता है,
वही हमारी समानता है:
ये सनातन नियम है, उस दुनिया का
जिसमें पुरुष की प्रधानता है..
-तबिष खैर (www.tabishkhair.co.uk)
अनुवादित: दिवाकर ए पी पाल

Kindly find the Original at
http://museindia.com/viewarticle.asp?myr=2011&issid=35&id=2407

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