Search the web

Custom Search

Saturday, May 14, 2011

डर

शाम की धुंधली रोशनी
की कसम,
आने वाली हर रात से
डरता हूँ.
एक ढर्रे पर चल रही है ज़िन्दगी
अर्सा बीत गया है यूँ ही;
मैं किसी भी नई शुरुआत से
डरता हूँ..

पौ-फ़टती हुई किरणें लाती होंगी
उम्मीद का उजाला,
मैं उम्मीद की किसी बात से
डरता हूँ.
रात के अन्धेरे में
साया भी साथ नहीं होता;
मैं अपने साये के भी साथ से
डरता हूँ..

पास न है कुछ
खोने को भी,
पर खोने के एहसास से
डरता हूँ.
जो भी हों
हालात मेरे;
पर बदले हुए हालात से
डरता हूँ..

डर-डर के जीता हूँ
रोज़ यूँही
मैं ज़िन्दगी की हार से
डरता हूँ.
मौत वो कैसी होगी
ज़िन्दगी से अलग;
मौत से लडकर,
हर रोज़ मैं मरता हूँ..

मैं ज़िन्दगी के खयाल से
डरता हूँ.
और हर रोज़ एक नई
मौत मैं मरता हूँ..
Dated: 15 May,2011

1 comment: