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Monday, June 27, 2011

प्रवासी (translated from Tabish Khair)

नए पैरों पर चलना सालता है:
व्यञ्जनों का अभिशाप,
लड़खड़ाते स्वर.

और तुम, जिसके लिए मैनें अपना साम्राज्य त्याजा;
कभी उसे प्यार न कर सका, जो मैं थी.

मेरे अतीत में दिख्ता है तुम्हे;
सिर्फ़
शल्क, और खर-पतवार.

कभी एक सुरीली आवाज़ की स्वामिनी,
आज दो पैर हैं मेरे पास.

अब मैं सोचती हूँ, कभी-कभी,
क्या ये तिज़ारत, सही थी?
-तबिष खैर
Dated- 28 june,2011

translated from, 'Immigrant' by TABISH KHAIR..

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