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Tuesday, March 1, 2011

Dated: 26 February,2011

वन मे हिरणी

हुई सतृष्ण.

जेठ दुपहरी,

जल विहिन..


भीषण लू,

मरुस्थल की रेत;

जलते हैं खुर:

बचने को

धधकती सी ज़मीन से

भागती है वो तेज़..

बेचैन..

तरु-वर की छाँव,

दूर नहीं;

पर पानी कहाँ!


रेगिस्तान मे बनता

एक प्रतिबिम्ब:

दौडती है वो,

हिरणी;

जल विहिन..


मरीचिका:

जीवन की अभिलाशा..


जरुरत:

कुदरत का खेल..

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