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Tuesday, August 2, 2011

प्रस्तुति" (प्रस्तुति(१९८५)- मलय राय चौधरी) का संशोधित हिंदी अनुवाद

प्रस्तुति

कौन कहता है कि बर्बाद हूँ मैं ?
बस यूँ, कि विष-दन्त नख-हीन हूँ?
क्या अपरिहार्यता है उनकी ?
कैसे भूल गए वो खन्जर?
उदर में मूठ तक घुसा हुआ?
बकरे के मुँह में इलायची की हरी पत्तियाँ,
वे सब घटनाएँ ? घृणा-कला, क्रोध-कला, युद्ध-कला !
बन्धक युवती सन्थाल;
फ़टे फ़ेफ़ड़ों से सुर्ख, खुखरी की चमकती बेचैनी ?
वो सब?
हृदय के खून से लथपथ, खिंचे हुए गर्वान्वित चाकू?
गीतहीन हूँ मैं, संगीतहीन- सिर्फ़ चीत्कारें
जितना खोल सकता हूँ मुख-
निर्वाक वन की भेषज़ सुगन्ध;
हरम - सन्यास या अंध-कोठरी.
मैंने कभी नहीं कहा, "जिव्हा दो, जिव्हा
वापस लो कराहें!
दाँत भींचे हुए, सहनशक्ति, वापस लो!"
निर्भय बारुद कहेगा: "एक मात्र शिक्षा है मूर्खता".
हाथ-हीन, अपंग
दांतो में खन्जर दबाए, कूद पड़ा हूँ, जुए कि बिसात पर.
घेर लो मुझे, चारों ओर से
चले आओ, जो जहाँ हो, नौकरीशुदा शिकारी के जूते में-
जरासन्ध के लिंग, जिस तरह विभाजित
हीरों की झुलसती आभा
हाथ पैर चलाने के अलावा और कोई ज्ञान, बचा नहीं जगत में
सेब के जिस्म की तरह मोम-मखमली नाज़ुक स्नेह
समागम से पहले पँख खोल कर रख देगी चींटी.
खम ठोंक कर मैं भी ललकारता हूँ ये विकल्प---
दुनिया को खाली करो! निकलो, निकल जाओ सर्वशक्तिमान!
बंदर के खुजाने वाले चार हाथों में
शन्ख-चक्र-गदा-पद्म:
अपने ही पसीने के नमक में लवण- विद्रोह हो
बारुद धाग के साथ धमाके की ओर, चलता रहे चिंगारी
वाक फ़सल के दुकानदारों, चले आओ!
शरीर में अन्धकार लीप-पोत कर
पिल्लों के झगड़े से गुलज़ार रातों में
कीटनाशक से झुलसे-अधमरे फ़तिंगों के दोपहरों में,
जमीनी ज्ञान से फ़िसलते केंचुए, ऊपर आओ-
खन्जर के लावण्य को फ़िर से इस इलाके में वापस लाया हूँ मैं.

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