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Wednesday, January 19, 2011

a new take on poetry....

एक और दिन ढल गया,

बोझिल और लाचार सा;

स्तब्ध चांदनी को कोहरे ने

छन्नी सा ढँक रखा है..

शायद ऒस की बूँद से भीगा होगा,

य़े गाल गीला मालूम पडता है;

आँसू तो अब आते नहीं,

इन पथरायी आँखों में.

जिन्दा रहने की चाहत है,

पता नहीं कैसे;

सफ़र ये कैसा है, चलना भी

रोज़ है और जाना कहीं नहीं.

मंज़िल क्या होती है,

जाना नहीं अब तक;

बस बेज़ार सा सफ़र है

पगडन्डी के रास्ते...

Dated: 16 January,2011

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