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Saturday, October 6, 2012

हिज्र की आखिरी रात


बड़ी मुश्किल से कटेगी ये 
हिज्र की आखिरी रात . 
ना सो पाउँगा मै, 
ना तुमको ही नींद आएगी . 

कितनी रातें कट गयीं तुम्हारे बिना . 
कितने दिन काटे 
ख्यालों में खोये हुए . 
पर आज बेसबब हुयी 
बेखुदी मेरी ; 
आज दिल को करार कहाँ .. 

ये चिराग की मद्धम लौ , 
ये जुल्फों से खेलता समीर . 
लगता है जैसे मिलकर , 
चिढ़ा रहे हों मुझे . 

बाँध ना पाऊं खुद को , 
इंतज़ार की घड़ियाँ 
मानो रुकी सी हों . 
कैसे कटेगी भला , 
हिज्र की ये आखिरी रात ..

                   dated : 30 June,2012

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