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पुणे डायरी - भाग एक (घुंघराले बालों वाली लड़की)

कॉलेज का गेट, जिसपर एक तोरण द्वार बना था, और अर्ध चंद्राकार काँक्रीट के फ़्रेम पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी के नाम दो भाषाओं में ऐल्यूमिनीयम की चमकती प्लेटों से लिखे थे – अंग्रेज़ी और मराठी। किसी जमाने में अंग्रेज़ी का साथ हिंदी को नसीब था, लेकिन अब ऐसा करना लोकल मानुष को चुनौती देना भी था, और क़ानूनन अपराध भी। हाँ, अगर तीन भाषाएँ लिख दो, तो किसी को आपत्ति नहीं होती, लेकिन इतनी ज़हमत और अतिरिक्त प्लेटों का खर्च उठाने की ज़रूरत ही क्या थी?  तोरण के नीचे दो फाटक थे, एक क़रीब 25 फ़ीट चौड़ा और दूसरा क़रीब 4 फ़ीट का। चौड़ा वाला फाटक गाड़ियों के लिए खुलता था, जिसे खोलने दरबान खुद चल कर आता था, और गुजरने वाली गाड़ियों को पहचान कर किसी किसी को सलाम भी ठोंकता था। संकरा वाला फाटक अमूनन खुला ही रहता था, और मोटर-साइकल, साइकल, स्कूटी और पैदल चलने वालों से दरबान उनका पहचान पत्र देखने के बाद ही पार करने की इजाज़त देता था। आर्थिक समाजवाद का ये नियम अलिखित, पर अटूट था। इसी फाटक के बाहर एक प्लास्टिक के बोरे को बिछाकर एक बुढ़िया बैठती थी, जो सिगरेट, पान-मसाला और गुटखा मार्केट प्राइस से 1 रुपया अधिक पर बे...

आज़ाद हूं!

आज़ाद लहरें, टकरा के जैसे अपनी ही मौज में तोड़ती हैं साहिल को - कतरा-कतरा, अपना रास्ता बनाती; कभी कभी उफनते जज़्बात बह निकलते हैं सब्र का बांध तोड़ आँखों के किनारों से। गुजर जाए जब कोई ऐसी गमगीन शब – रात की जमा किरचों को ठंडे पानी के धार से धो लेता हूँ और निकल जाता हूँ वापस एक नई मौज़ पर सवार एक नए सफ़रनामे की तलाश में।                          28-नवम्बर-2020

यादों की गठरी

कहते हैं – घर में छुपे किसी सामान से, बिगड़ जाता है घर का वास्तु; और छिन जाती है शांति। यही सोच कर शायद, जानबूझकर छोड़ी थी मैंने, तुम्हारे मन-मंदिर के एक अनछुए कोने में – जहां पहुँच ना सके तुम्हारे हाथ, या नज़र - अपनी यादों की गठरी। छुपाई थी – स्वार्थ वश ताकि, दूर चले जाने पर भी कभी-ना-कभी मेरा ख़याल, किसी नशेमन में कर सके तुम्हें बेचैन। बँधी है उस गठरी में कितनी ही शामें – कुछ नर्म, कुछ सर्द कुछ – पसीने से भीगी। कितनी सुबहें, तुम्हारे गीले बालों से झटकती बूंदें। कितनी रातें, मेरे कंधे पर टिका तुम्हारा सिर, और सीने पर बिखरी जुल्फ़ें। कितनी अलसाई दोपहरी - छोड़े हैं मैंने, तुम्हारी गर्दन पर, कान के नीचे – अपनी तप्त साँसों की भाप; और तुम्हारी कमर पर अपनी उँगलियों के एहसास। शायद किसी सर्द शाम में तुम्हारे काँपते कंधों पर रखा था अपनी जैकेट का भार; देखी थी किसी उदास शाम में तुम्हारे गालों पर ढलके अश्क़ और किसी खिलखिलाती सुबह की रोशनी-सी, तुम्हारे होंठों पे हँसी। भारी थी बहुत, जब बांधी थी मैंने वो गठरी – अपने अकेले कंधे पर उसका बोझ गवारा नहीं था मुझे! हाँ – स्वार्थी था मैं – छोड़ दिया था मैंन...

बनारस - हरिश्चंद्र घाट

हरिश्चंद्र घाट पर, एक चट्टान पर बैठा एक रेतीले ढलाव के अंत पर, पानी की कगार पर – राख से काली पड़ चुकी है जो। लकड़ी का एक ऊँचा ढेर जल रहा है और एक आदमी का सिर उल्टा लटका है गहरा गयी है नाक और अधजला मुँह काले बिखरे बाल, बाकी – छातियाँ – पेट – एक ही रेखा में, जाँघों के बराबर चिता के ऊपर बिछे और दूसरी ओर पैर बाहर निकले – जिनकी अंगुलियाँ तपकर सिकुड़ गई हों – मुड़ गयी हों। चीत्कार मारते बत्तख़, और भीड़ लगाए सारस – सुराहीदार गर्दन वाले – का याराना मिलकर छिछले पानी की कगार में चोंच मारते इस आग से, कुछ ही फुट दूर।                               एलेन गिन्सबर्ग                               (इंडियन जर्नल्स 1962-63)                               अनुवाद - दिवाकर एपी पाल

सब मिथ्या है!

मिथ्या से ही मिथक बने मिथकों से ही बनी कहानी वही कहानी, बदल बदल कर सुनाए नाना नानी। वही कहानी जोड़ जोड़ कर, काव्य बने - महाकाव्य बने। जो जीता वो ईष्ट हुआ, जो हारा वो दुष्ट। वही कहानी रूप बदल कर जहाज़ों के संग पार चली, यवनों के देव असुर बने आर्यों के असुर देव!                     (25 अगस्त 2020)

मजदूर - शेरनाज़ वाडिया

सतह से पांच मंज़िल दूर, एक झूले से लटका - मानों बिना सुरक्षा जाल के एक कलाबाज़ ।  बड़ी कशिश से चुपड़ता है सिमेंट एक बार।  बार-बार; और दीवारें खूबसूरत और जीवंत होती जाती हैं - पानी से बची रहेंगी ये, भविष्य में. पर.. उसकी खुद की कोई सुरक्षा योजना नहीं है - अपने स्वास्थ्य और ज़िन्दगी के लिये. टीबी से अवरुद्ध फ़ेंफ़ड़े लगभग फ़ट-से पड़ते हैं लगातार टीसती खाँसी से।  उसके सपने और उनकी पूर्ती पुराने आवरण की तरह।  छिज़ जाती है - तार-तार होकर और नये - गणित ही गलत हैं - उसकी मजदूरी के अर्थशास्त्र में! घटते, और विभाजित: खोए तज्यअस्तित्व के खपत में।                      “द लेबरर” – शेरनाज वाडिया                          अनुवाद – दिवाकर एपी पाल

बरसाती शाम

आज फिर रात को, तेज़ बारिश के आसार हैं, मॉनसून ने दस्तक दे दी है। बदली से ढंके आसमान को देख, कई साल पहले की वो शाम याद आ गई, हाँ, ऐसी ही तो थी, वो बरसाती शाम! उस रोज़ भी शाम यूं ही, जल्द घिर आयी थी, और कॉलेज से थोड़ा जल्दी आ गया था मैं- तुम्हें, बिना बताए। और उस शाम, तुम्हारा फोन आया – कई बार, तुम्हें खाने थे – मिश्रा की दूकान के पकौड़े, हलकी बारिश में – अपने दुपट्टे को आंचल बना ओढ़ - अदरक वाली चाय की चुस्कियों के साथ। और इधर मुझे यारों ने, सस्ती व्हिस्की पिला, चिप्स के साथ बिठा लिया था - कैरम खेलने एक लापरवाह शाम के बहाने; और फोन नहीं उठाया था, मैंने तुम्हारा! कितना लड़ी थी तुम, कितनी माफियां मांगी थी मैंने, और अगले दिन, नाराज़ तुम कॉलेज नहीं आई। और फिर, मूसलाधार बारिश में भींग – छतरी तब भी नहीं रखता था मैं – तुम्हारे हॉस्टल के नीचे, ऑमलेट और पाव लेकर, तुम्हें मनाया था, ठंडी-कटिंग चाय के साथ। चलो इसी याद के नाम, एक चाय पिला दो - वही अदरक वाली।                              ( जून 2020)