आज़ाद हूं!

आज़ाद लहरें,
टकरा के जैसे
अपनी ही मौज में
तोड़ती हैं साहिल को -
कतरा-कतरा,
अपना रास्ता बनाती;
कभी कभी उफनते जज़्बात
बह निकलते हैं
सब्र का बांध तोड़
आँखों के किनारों से।

गुजर जाए जब
कोई ऐसी गमगीन शब –
रात की जमा किरचों को
ठंडे पानी के धार से
धो लेता हूँ
और निकल जाता हूँ
वापस
एक नई मौज़ पर सवार
एक नए सफ़रनामे की तलाश में।

                    28-नवम्बर-2020

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