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 बताया हमें - पाकिस्तानी, ख़ालिस्तानी, देशद्रोही -  राजधानी में प्रवेश निषेध  गड्ढे-कीलें, कँटीली तारों से बनी बाड़; देश बचा लो, आए किसान! छुपाया - 2 डिग्री की सर्द रातें,  वॉटर क़ैनन की ठंडी बौछारें  बर्फीली हवा, बारिश का पानी। 40 डिग्री की तप्त दोपहर, आँखों को चुंधियाती धूप।  गोली की मार, और  जीप की टायर की ज़द।  और हमें दिखाया महज़ - एयरकंडीशन तम्बू, लंगर का पिज़्ज़ा,  वाई-फ़ाई के राउटर, राहती मसाज़।

क्या विषय, क्या विषय!

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अरे रबीन्द्रनाथ! पहचाना? नाचा था मैं तुम्हारे साथ? इकतारे पर लोक-गीत की अधूरी धुन बजाई थी भीड़ वाली गली से सुनसान लौंग बाजार तक साथ चलते-चलते बताया था तुमने – तुम सियालदह से आ रहे, और अलमुद्दीन के दफ्तर तक जा रहे। तुम्हारे गर्म, अंगारों-से होंठों पर – जो बने थे आग और पानी से, अब भी पवित्र गीतों की तान थी – कितनी तप्त! तुमने फेंक दिया अपना ऊनी लबादा, जिसमें छुपे थे जोंक – मुझे जोंक दिखे थे! तुम्हारे सुर्ख बदन पर – जोरसांको ठाकुरबाड़ी मे बहुत जोंक होते हैं, बरसात के दिनों मे। मटन कबाब की गंध पर, जब तुमने पूछा – क्या पका रहे हो मियाँ? उसने बोला – पता नहीं तुम्हें! सिर्फ़ साँड़ का माँस। एक खाकर तो देखो। चाय की टपरी पर, गंजे, बकर-दाढ़ी वाले व्लैदिमिर इल्लिच, सुनहरे बालों वाली वेरा इवानोवा यासुलीच और तुम्हारे जैसे चंदीली दाढ़ी वाले एग्जेलरॉड और मार्तोव जिनके गाल काँप रहे थे, और तुमने पूछा था – इनके धड़ कहाँ हैं? जब मैंने नाचना बंद नहीं किया, असहाय था मैं तुमने अपना इकतारा  मुझे दान दे देना चाहा क्यूँकि हर किसी ने, मौक़ा पाते ही, छीनी है तुम्हारे कदमों की ताल और अभी, दिन के वक्त भी हैलॉजेन जल...

अजीब से बच्चे

वो गोद में बैठ या कंधे से लटक लोरियाँ नहीं सुनना चाहते ना किस्से। वो सिहर जाते हैं, जब गुजरता हूँ  उनके पास से उनकी हंसी, दबी-दबी सी है पर, वो रोते तो कभी नहीं दिखे मुझे। खेलते तो हैं आपस में, पर सहम जाते हैं जब दिखाऊं चॉकलेट या बिस्कुट। अक्सर सोते हुए चौंक कर उठ जाते हैं बिस्तर में। ये कैसे बच्चे हैं, जो हम बड़ों के एहसास से भी डरते हैं।                               14 -अगस्त - 2021

जनता भूल जाएगी

आंकड़ों की बाज़ीगरी में लग चुके हैं मानवीय संवेदनाओं के सौदागर। यकीन है उन्हें, याददाश्त क्षणभंगुर है जनता की - भूल जाएगी! धर्मांधता और जातिवादी नारों के शोर में - अपनों की मौत और अपने खुद के आंसू -  शमशानों में  जलती चिताओं की लपटती लौ गंगा में बहती पानी से फूल चुकी लाशें -  दफ़न, ज़मींदोज़  अनजान लाशें,  जो कभी लोग थे। जनता भूल जाएगी  मदद की गुहार पर मिली  अनजानी शक्लों के हाथों - नाम, पता, शक्ल, या जाति-धर्म पूछे बिना अनजाने कंधे, सहारे और  खून और हवा।    याद रहेगा बस अपना मजहब, अपने धर्मगुरु, अपनी जाति, अपना गुमान! अपनी नफरत वापस सर उठाएगी और उंगलियां चलेगी वोट पर या कटारें, गड़ांसे, या जुबान। जो भी हो, जनता भूल जाएगी।                                    - 12 अगस्त, 2021

अपवित्र

गांव के एक छोर पर मेरा घर था, और कभी गांव से बाहर जाना मेरे नसीब में 10 साल की उम्र तक आया नहीं। 10 साल की उम्र में पिताजी ने नवोदय विद्यालय की परीक्षा दिलवाने के लिए पहली बार मुझे गांव से मुजफ्फरपुर तक का सफर कराया था। ये, 1992 की बात रही होगी शायद।  आज भी बिलकुल साफ साफ याद है मुझे, वो पहला सफर। मां ने ठेकुआ, निमकी और लिट्टी, थोड़े प्याज और हरी मिर्च के साथ बांध कर दिया था, जो खादी के चारखाने प्रिंट के थैले में (हम उसे झोला बोलते थे) रख कर पिताजी और मैं, मुंह-अंधेरे निकल गए थे। पड़ोस वाले महतो चाचा ने अपनी बैलगाड़ी से हमें कस्बे तक पहुंचाया था, उनको हाट करना था, और हमें आगे मुज़फ्फरपुर तक जाना। यहां से हमने एक बस ली थी, जिसने मुज़फ्फरपुर पहुंचा दिया था 7 बजे तक। परीक्षा सेंटर के बाहर पहुंचने में हमें 15-20 मिनट और लगे होंगे। परीक्षा 10 बजे से होनी थी, तो पिताजी ने एक अखबार खरीदा, और उसे बिछा कर हम दोनो ने पहले उसपर बैठ कर खाना खाए, और फिर आजू-बाजू लेट गए। मेरी आंख लग गई थी, पर पिताजी शायद सिर्फ कमर सीधी करना चाहते थे।  दो घंटे का पेपर रहा होगा, और प्रश्न क्या क्या थे मु...

मेरा स्वदेस

नहीं कह सकता,  कि उत्तरपारा का मेरा पैतृक घर,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  आँखें-नुचीं लावारिश लाशें गंगा में तैरती है वहाँ।  नहीं कह सकता,  कि अहिरीटोला में मौसी का घर,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  अपहृत लड़कियाँ बंधी, घुटती हैं पास ही सोनागाछी में। नहीं कह सकता,  कि पनिहाटी में चाचा का घर,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  कौन कहाँ मारा गया, सरेआम दिन-दहाड़े। नहीं कह सकता,  कि बचपन का कोणनगर वाला घर,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  किसे भेजा गया था, गला रेतने को।  नहीं कह सकता,  कि जवानी का कलकत्ता,  मेरा स्वदेस नहीं  मैं जानता हूँ,  किसने फेंका था बम, लगाई थी बसों-ट्रामों में आग। नहीं कह सकता,  कि पश्चिम बंगाल,  मेरा स्वदेस नहीं  हक़ है मुझे, यहाँ  लॉक-अप में बंद, मृत्यु-पर्यंत यातनाओं का। हक़ है मुझे, यहाँ  चाय बाग़ानों में भूखमरी का। हक़ है मुझे, यहाँ  हैंडलूम मिलों में फांसी लगा झूलने का। हक़ है मु...

पुणे डायरी - भाग एक (घुंघराले बालों वाली लड़की)

कॉलेज का गेट, जिसपर एक तोरण द्वार बना था, और अर्ध चंद्राकार काँक्रीट के फ़्रेम पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी के नाम दो भाषाओं में ऐल्यूमिनीयम की चमकती प्लेटों से लिखे थे – अंग्रेज़ी और मराठी। किसी जमाने में अंग्रेज़ी का साथ हिंदी को नसीब था, लेकिन अब ऐसा करना लोकल मानुष को चुनौती देना भी था, और क़ानूनन अपराध भी। हाँ, अगर तीन भाषाएँ लिख दो, तो किसी को आपत्ति नहीं होती, लेकिन इतनी ज़हमत और अतिरिक्त प्लेटों का खर्च उठाने की ज़रूरत ही क्या थी?  तोरण के नीचे दो फाटक थे, एक क़रीब 25 फ़ीट चौड़ा और दूसरा क़रीब 4 फ़ीट का। चौड़ा वाला फाटक गाड़ियों के लिए खुलता था, जिसे खोलने दरबान खुद चल कर आता था, और गुजरने वाली गाड़ियों को पहचान कर किसी किसी को सलाम भी ठोंकता था। संकरा वाला फाटक अमूनन खुला ही रहता था, और मोटर-साइकल, साइकल, स्कूटी और पैदल चलने वालों से दरबान उनका पहचान पत्र देखने के बाद ही पार करने की इजाज़त देता था। आर्थिक समाजवाद का ये नियम अलिखित, पर अटूट था। इसी फाटक के बाहर एक प्लास्टिक के बोरे को बिछाकर एक बुढ़िया बैठती थी, जो सिगरेट, पान-मसाला और गुटखा मार्केट प्राइस से 1 रुपया अधिक पर बे...

आज़ाद हूं!

आज़ाद लहरें, टकरा के जैसे अपनी ही मौज में तोड़ती हैं साहिल को - कतरा-कतरा, अपना रास्ता बनाती; कभी कभी उफनते जज़्बात बह निकलते हैं सब्र का बांध तोड़ आँखों के किनारों से। गुजर जाए जब कोई ऐसी गमगीन शब – रात की जमा किरचों को ठंडे पानी के धार से धो लेता हूँ और निकल जाता हूँ वापस एक नई मौज़ पर सवार एक नए सफ़रनामे की तलाश में।                          28-नवम्बर-2020

यादों की गठरी

कहते हैं – घर में छुपे किसी सामान से, बिगड़ जाता है घर का वास्तु; और छिन जाती है शांति। यही सोच कर शायद, जानबूझकर छोड़ी थी मैंने, तुम्हारे मन-मंदिर के एक अनछुए कोने में – जहां पहुँच ना सके तुम्हारे हाथ, या नज़र - अपनी यादों की गठरी। छुपाई थी – स्वार्थ वश ताकि, दूर चले जाने पर भी कभी-ना-कभी मेरा ख़याल, किसी नशेमन में कर सके तुम्हें बेचैन। बँधी है उस गठरी में कितनी ही शामें – कुछ नर्म, कुछ सर्द कुछ – पसीने से भीगी। कितनी सुबहें, तुम्हारे गीले बालों से झटकती बूंदें। कितनी रातें, मेरे कंधे पर टिका तुम्हारा सिर, और सीने पर बिखरी जुल्फ़ें। कितनी अलसाई दोपहरी - छोड़े हैं मैंने, तुम्हारी गर्दन पर, कान के नीचे – अपनी तप्त साँसों की भाप; और तुम्हारी कमर पर अपनी उँगलियों के एहसास। शायद किसी सर्द शाम में तुम्हारे काँपते कंधों पर रखा था अपनी जैकेट का भार; देखी थी किसी उदास शाम में तुम्हारे गालों पर ढलके अश्क़ और किसी खिलखिलाती सुबह की रोशनी-सी, तुम्हारे होंठों पे हँसी। भारी थी बहुत, जब बांधी थी मैंने वो गठरी – अपने अकेले कंधे पर उसका बोझ गवारा नहीं था मुझे! हाँ – स्वार्थी था मैं – छोड़ दिया था मैंन...

बनारस - हरिश्चंद्र घाट

हरिश्चंद्र घाट पर, एक चट्टान पर बैठा एक रेतीले ढलाव के अंत पर, पानी की कगार पर – राख से काली पड़ चुकी है जो। लकड़ी का एक ऊँचा ढेर जल रहा है और एक आदमी का सिर उल्टा लटका है गहरा गयी है नाक और अधजला मुँह काले बिखरे बाल, बाकी – छातियाँ – पेट – एक ही रेखा में, जाँघों के बराबर चिता के ऊपर बिछे और दूसरी ओर पैर बाहर निकले – जिनकी अंगुलियाँ तपकर सिकुड़ गई हों – मुड़ गयी हों। चीत्कार मारते बत्तख़, और भीड़ लगाए सारस – सुराहीदार गर्दन वाले – का याराना मिलकर छिछले पानी की कगार में चोंच मारते इस आग से, कुछ ही फुट दूर।                               एलेन गिन्सबर्ग                               (इंडियन जर्नल्स 1962-63)                               अनुवाद - दिवाकर एपी पाल

सब मिथ्या है!

मिथ्या से ही मिथक बने मिथकों से ही बनी कहानी वही कहानी, बदल बदल कर सुनाए नाना नानी। वही कहानी जोड़ जोड़ कर, काव्य बने - महाकाव्य बने। जो जीता वो ईष्ट हुआ, जो हारा वो दुष्ट। वही कहानी रूप बदल कर जहाज़ों के संग पार चली, यवनों के देव असुर बने आर्यों के असुर देव!                     (25 अगस्त 2020)

मजदूर - शेरनाज़ वाडिया

सतह से पांच मंज़िल दूर, एक झूले से लटका - मानों बिना सुरक्षा जाल के एक कलाबाज़ ।  बड़ी कशिश से चुपड़ता है सिमेंट एक बार।  बार-बार; और दीवारें खूबसूरत और जीवंत होती जाती हैं - पानी से बची रहेंगी ये, भविष्य में. पर.. उसकी खुद की कोई सुरक्षा योजना नहीं है - अपने स्वास्थ्य और ज़िन्दगी के लिये. टीबी से अवरुद्ध फ़ेंफ़ड़े लगभग फ़ट-से पड़ते हैं लगातार टीसती खाँसी से।  उसके सपने और उनकी पूर्ती पुराने आवरण की तरह।  छिज़ जाती है - तार-तार होकर और नये - गणित ही गलत हैं - उसकी मजदूरी के अर्थशास्त्र में! घटते, और विभाजित: खोए तज्यअस्तित्व के खपत में।                      “द लेबरर” – शेरनाज वाडिया                          अनुवाद – दिवाकर एपी पाल

बरसाती शाम

आज फिर रात को, तेज़ बारिश के आसार हैं, मॉनसून ने दस्तक दे दी है। बदली से ढंके आसमान को देख, कई साल पहले की वो शाम याद आ गई, हाँ, ऐसी ही तो थी, वो बरसाती शाम! उस रोज़ भी शाम यूं ही, जल्द घिर आयी थी, और कॉलेज से थोड़ा जल्दी आ गया था मैं- तुम्हें, बिना बताए। और उस शाम, तुम्हारा फोन आया – कई बार, तुम्हें खाने थे – मिश्रा की दूकान के पकौड़े, हलकी बारिश में – अपने दुपट्टे को आंचल बना ओढ़ - अदरक वाली चाय की चुस्कियों के साथ। और इधर मुझे यारों ने, सस्ती व्हिस्की पिला, चिप्स के साथ बिठा लिया था - कैरम खेलने एक लापरवाह शाम के बहाने; और फोन नहीं उठाया था, मैंने तुम्हारा! कितना लड़ी थी तुम, कितनी माफियां मांगी थी मैंने, और अगले दिन, नाराज़ तुम कॉलेज नहीं आई। और फिर, मूसलाधार बारिश में भींग – छतरी तब भी नहीं रखता था मैं – तुम्हारे हॉस्टल के नीचे, ऑमलेट और पाव लेकर, तुम्हें मनाया था, ठंडी-कटिंग चाय के साथ। चलो इसी याद के नाम, एक चाय पिला दो - वही अदरक वाली।                              ( जून 2020)

रक्त-गीत - मलय राय चौधरी

अवन्तिका!  छापा पड़ा था, मेरे घर में,  आधी रात को, तुम्हे ढूंढते हुए  इसकी तरह नहीं, ना ही उसकी तरह,  और उनकी तरह तो बिल्कुल भी नहीं तुलना-हीन:  इसकी, उसकी या किसी से भी क्या किया है मैंने,  कावित्त के लिए,  धधकते, लावा उगलते ज्वालामुखी में प्रवेश करके?  क्या हैं ये?  क्या हैं ये?  घर की तलाशी का परिणाम कावित्त का?  नशेमन भूरे बच्चे, पिता की टूटी अल्मारी से  कावित्त का!  पुराने बुँदिले बक्से को फ़ाड़कर  निकली हुई माँ की बनारसी साड़ीयाँ  कावित्त का!  साँसें दर्ज़ हैं,  जब्ती-सूची में  कावित्त का?  दिखाओ, दिखाओ मुझे,  और क्या क्या निकल आ रहा है?  कावित्त का!  शर्म करो;  लड़की द्वारा आधे-चाटकर  परित्यक्त लड़के! मरो, तुम मरो  कावित्त का!  लहरों को चीरती शार्क  चबा जाती हैं माँस और हड्डियाँ कावित्त का!  एबी नेगेटिव सूर्य,  क्षुद्रांत की गाँठों से कावित्त का!  अधीर पदचिन्हों मे सहेजे -  घुँटी रफ़्तार कावित्त का!  मल-मूत्र से भरे कारा में ...

नोटबुक

पड़े हैं, बिस्तर के करीब कई मोमबत्तियों के पिघले टुकड़े - माचिस की अधजली तीलियाँ; ये पूरी भरी हुई ऐशट्रे और खाली रम की बोतलें. दर्ज़ हैं कई उलझे ख़्याल - दबे से जज़्बात. खो चुके हैं कितने मिसरे, कितने ही हर्फ़ इन गुजरी रातों में. अधूरी नज़्मों से रंगे हैं मेरी नोटबुक के पन्ने.                     (02-07-2020 )

सैनिटरी नैपकिन - मलय रॉय चौधरी

प्रेम, उस लड़की की तरह है, जिसे स्कूल छोड़ देना पड़ता था हर माह, साढ़े तीन दिन पहनना पड़ता था कपड़े में बाँध सूखे घास, और बरसात के दिनों में, चुँकि घास हरी होती है तो, कपड़े में राख बाँध, ताकि सोख सके मासिक स्राव - और अकेली बैठे, किताबों से दूर.                                मलय राय चौधरी                               अनुवाद: दिवाकर एपी पाल

शांति

स्तब्ध, नि:शब्द, भावहीन प्रस्तर-सम नयन - नीरहीन। शून्य को समर्पित दृष्टि, दृष्यहीन। कोप नहीं, द्वेष नहीं, राग नहीं, वैराग्य नहीं शोक नहीं और हास्य नहीं - पूर्णत: संवेदनहीन। और ठीक समक्ष, बैठी है वो, देखती खुद को, एक मुस्कुराहट, अधरों पर लिए मुख पर, एक असीम शांति। बंधनमुक्त, अवध्य, अनंत की ओर प्रस्थान को आतुर।                (24 - जून - 2020)

भटकती रुहों की कब्रगाह

सजती है ये कब्रगाह - हर रात एक नई महफ़िल में, मधुर झंकारों के शोर में. आते हैं वे सभी और मनाते हैं शोक अपनी रुह की मौत का - छलकते शराब और सिगरेट के धुओं में; कुछ खुशनसीब - शैम्पेन और सिगार में. इन रुहों मे है: एक पुलिसमैन - छोड़ा जिसने एक दुर्दांत अपराधी को रिश्वत लेकर. एक डौक्टर - जिसने मरीज़ को न देख, उसकी जेब को देखा. एक वकील - जिसने दिलाई एक कातिल को ज़मानत मोटी फ़ीस वसूलकर एक जज़ - जिसने सुनाया था एक गलत फ़ैसला लालच या दबाव में. कुछ ऐसी भी हैं रुहें जो शराब खरीद नहीं सकते खड़े महफ़िल के बाहर शिकायती अंदाज़ में - आखिर उन्हे भी है अपराधबोध! ये कब्रगाह - हर रात सजती है. अफ़सोस है उन्हे अपनी मौतों का - मनाते हैं शोक - पीकर शराब, सिगरेट के धुओं के बीच लज़ीज़ पकवानों का स्वाद लेकर. Translated from my poem "Graveyard of Lost Souls" written in 2013.

पुरानी डायरी

कुछ पुराने कागज़ात ढूँढते वक्त, हाथ आई ये पुरानी डायरी. पीले बदरंग कवर में, सन २००१ की मटमैले पन्ने थोड़े फूले से, शायद कभी भींग गये होंगे - इन गुजरे सालों में. पलटे जो पन्ने मैंने, उत्सुकता मे, और देखा, पुराने पन्नो में दर्ज़ कई कविताएँ, कई ख्याल, और कुछ आकांक्षाएँ. कितने ही हर्फ़, भूल चुका हूँ अब कितने - जिनके आज कोई मायने नहीं. कुछ पन्ने, जिनकी लिखावट धुल गई है, शायद फ़ाउन्टेन पेन से लिखी थी - ये इबारत खास थे, जब लिखे थे, अब मिट गये हैं वक्त के हाथों. एक तस्वीर, चिपका रखी थी मेरे पिता की - एक पन्ने पर. वो आज भी वैसी ही है - अब मुस्कुराती सी दिखती है माँ का साथ जो मिल गया है. एक-दो पत्र - स्टेपल से संजोए कुछ खास नहीं लिखा उनमें, पर आजकल चिट्ठियाँ कौन लिखता है भला. अधिकतर कविताएँ - आज पढ़ा तो हँस पड़ा! लिखना शुरु किया था मैंने, ऐसी बचकानी तुकबंदियों से. उन ख्यालों को किसी दिन, फ़िर से लिखूंगा एक प्रौढ़ मन से. ये डायरी आधी ही भरी है, और आखिरी दर्ज़ है, २०११ नवम्बर में. लिखना बन्द कर दिया था मैंने - क्यूँ? क्या हुआ उसके बाद? मुझे खुद याद नहीं.            ...

मां

ये आंचल, ये गोद, या शायद सिर्फ तुम्हारा साया है मां! पता नहीं क्यूं, तुमसे बात कर सिर्फ सुकून ही पाया है। भूल चुका हूं, तुम्हारी पहली याद - पता नहीं क्यूं! 3-4 साल की उम्र होगी जब तुम्हे पहली बार देखा था, या देखी थी, तुम्हारी वो जीवट मातृ शक्ति, जो तुम्हारी इकलौती पहचान है। फिर शायद तुम्हारी आदत वापस बन गई। वैसे ही देखा तुम्हे अगले कुछ सालों तक कभी कमजोर पड़ी भी तो हमारे सामने ज़ाहिर ना होने दिया। अकेले ही ढोया अकेले ही झेला, तुम-सा सहनशील, मजबूत, निस्वार्थ और निर्मल किसी और को ना देखा। पहली बार कमजोर देखा था तुम्हे, कुछ महीने पहले! और वो मंजर, शायद सबसे खौफनाक है मेरी ज़िन्दगी का। मां! मर्द होने का दंश है, पर तुम्हारी औलाद शायद पहले हूं! रोना आता है, पर तुम्हारे सामने मुस्कुराता हूं, बस यही सोच सोच की कहीं, मेरी पलकों में तुम्हें कोई कतरा दिख ना जाए। पता है मुझे, मां मेरी आंखों के आंसू, तुमसे बर्दाश्त नहीं होते। नहीं रोऊंगा मैं मां, कम से कम, तुम्हारे सामने नहीं! आखिर एक वादा किया था, कुछ 20 साल पहले अपने मन में! पर आज उस...